मझौलिया। रासायनिक उर्वरकों के लगातार बढ़ते उपयोग से मिट्टी की उर्वरा शक्ति और गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर के वैज्ञानिक किसानों को हरी खाद के रूप में ढैंचा की खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे मिट्टी की सेहत बेहतर होगी और रासायनिक खादों पर निर्भरता भी कम होगी।
ढैंचा से मिलेगी प्राकृतिक नाइट्रोजन
कृषि विज्ञान केंद्र के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह ने बताया कि ढैंचा एक दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले लाभकारी जीवाणु पाए जाते हैं। फसल को 45 से 50 दिनों की अवस्था में खेत में जोतकर मिला देने पर प्रति एकड़ लगभग 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन की पूर्ति हो जाती है। इससे 50 से 60 किलोग्राम यूरिया की बचत संभव है।
मिट्टी की उर्वरा शक्ति होगी मजबूत
वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जल धारण क्षमता में सुधार होता है और भूमि अधिक भुरभुरी एवं उपजाऊ बनती है। इससे फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में भी मदद मिलती है।

कम खर्च में अधिक लाभ
पौधा संरक्षण वैज्ञानिक डॉ. सौरभ दुबे ने बताया कि प्रति एकड़ ढैंचा की खेती पर केवल 800 से 1000 रुपये का खर्च आता है, जबकि रासायनिक उर्वरकों पर होने वाला 2000 से 2500 रुपये तक का खर्च बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ढैंचा की फसल खेतों में खरपतवार नियंत्रण में भी प्रभावी भूमिका निभाती है।
***18 जून को होगा प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण
कृषि विज्ञान केंद्र, माधोपुर द्वारा 18 जून को प्राकृतिक खेती विषय पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस कार्यक्रम में 200 से अधिक किसानों के शामिल होने की संभावना है। वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे खाली खेतों में ढैंचा की बुआई करें और फूल आने से पहले उसे खेत में पलट दें। उन्होंने इसे धरती माता की सच्ची सेवा और टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।













